मेरठ 23 अक्टूबर (चमकता युग) मेरठ होटेलिर्स एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के महामंत्री विपुल सिंघल ने बताया है की मेरठ में स्थित ज्यादातर होटल रेस्टोरेंट में कोयले की जगह गैस की भट्टियां लगी हुई है, उनमें भी ज्यादातर होटल रेस्टोरेंट में गैस की पाइप लाइन द्वारा पी.एन.जी गैस का इस्तेमाल किया जा रहा है। मात्र तंदूर के लिए कुछ होटल में कोयले के स्थान पर चारकोल का इस्तेमाल किया जाता है। चारकोल लकड़ी का बना कोयला होता है,जिसे लकड़ी को कम हवा में पकाकर कोयले का रूप दिया जाता है। पक्का कोयला किसी भी होटल रेस्टोरेंट में रोटी बनाने में इस्तेमाल ना होता है और ना ही किसी प्रकार से उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। चारकोल यानी लकड़ी के कोयले की तपश कम होने के कारण यह तंदूर में रोटी बनाने के काम में आता है। कुल मिलाकर मेरठ शहर में होटलों द्वारा 1 दिन में सौ से डेढ़ सौ किलो कोयला मात्र इस्तेमाल किया जाता है। चारकोल का बड़ा उपयोग पेपर,मेल केमिकल फैक्ट्री,मेडिकल फैक्ट्री तथा अन्य जगहों पर जहां बायलर लगाए होते हैं वहां इसका इस्तेमाल बड़े रूप में किया जाता है। चारकोल का इस्तेमाल होटल के अतिरिक्त सर्दियों के मौसम में सर्दी को दूर रखने के लिए घरों में,चौकीदारों के पास,थानों में,दफ्तरों में किया जाता है। पुराने सरकारी बंगलों में ड्राइंग रूम तथा बेडरूम में चिमनी लगाकर घर को गर्म रखने के लिए इस कच्चे कोयले का इस्तेमाल सदियों से होता चला आ रहा है। आज भी सर्दी भगाने का एकमात्र विकल्प यही होता है। कच्चा कोयला यानी चारकोल में किसी भी प्रकार का धुआं नहीं होता। एक बार आग लगने के बाद यह लाल रंग का हो जाता है और अंतिम दौर तक राख बनने तक यह इसी प्रकार से रहता है, किसी भी प्रकार का धुआं इस कोयले से नहीं निकलता है। वही विपुल सिंघल ने मेरठ के मंडलायुक्त से कहा है कि वह किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले होटल एसोसिएशन से वार्ता कर इसकी सच्चाई जानकर ही कोई निर्णय लें।
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