नई दिल्ली 10 जनवरी (CY न्यूज) दिल्ली की एक महिला जज से 2007 में जबरन वसूली करने और उनके दो बच्चों को जान से मारने की धमकी देने के मामले में एक व्यक्ति को पांच साल कारावास की सजा सुनाई गई है। दोषी व्यक्ति महिला न्यायाधीश की अदालत में ही सहायक अहलमद का काम करता था। दिल्ली की एक अदालत ने दोषी शिवशंकर प्रसाद सिन्हा को 5 साल कैद की सजा सुनाते हुए कहा कि इस घटना ने न्याय की धारा को प्रभावित किया है और न्यायाधीशों तथा उनके सहयोगी कर्मचारियों के बीच विश्वास की कमी पैदा की। मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट पंकज शर्मा ने कहा कि इस घटना से पहले तक दोषी शिव शंकर प्रसाद सिन्हा शिकायतकर्ता न्यायाधीश किरण बंसल की अदालत में सहायक अहलमद के रूप में कार्य करता था। बंसल उस वक्त सिविल जज थीं। अदालत ने कहा कि जाहिर है, उस दौरान दोषी को महिला न्यायाधीश के परिवार के सदस्यों और उनकी कमजोरियों के बारे में पता चला। कोर्ट ने आगे कहा कि दोषी ने पीड़िता को जबरन वसूली के लिए लगातार धमकी भरे मैसेज भेजकर एक अपराधी की तरह काम किया। दोषी ने शिकायतकर्ता से उस वक्त चार लाख रुपये की मांग की थी, जब वह तीस हजारी जिला न्यायालय परिसर में मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के रूप में तैनात थीं और दोषी ने पैसे नहीं देने पर उनके बच्चों को जान से मारने की धमकी दी थी। एक लिखित मैसेज में दोषी ने किरण बंसल के पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी थी। इस घटना के बाद आरोपी को सेवा से हटा दिया गया था। अदालत ने शुक्रवार को दिए गए अपने आदेश में कहा कि कार्यस्थल पर ‘भरोसे’ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और आमतौर पर सह-कर्मचारी या एक अधिकारी अपने सहयोगी कर्मचारियों पर भरोसा करता है। अदालत का कहना था कि दोषी व्यक्ति ने अपनी बॉस की संवेदनशीलता से अवगत होने के बाद उस भरोसे का खून किया था और न्यायाधीश को उनके बच्चों की मौत का भय दिखाकर रुपये ऐंठने की नापाक साजिश रची थी। अदालत ने कहा कि दोषी ने न केवल बॉस (शिकायतकर्ता) के भरोसे को तोड़ा है, बल्कि उसने उस भरोसे को भी तोड़ दिया है, जो एक अधिकारी अपने सहयोगी स्टाफ के साथ रखता है। जज के मन में डर पैदा करने से उनकी ठीक से काम करने की क्षमता प्रभावित होती है। यह न्याय व्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करता है और यह अक्षम्य कृत्य है। अदालत ने अपराध को ‘एक गंभीर कृत्य’ करार देते हुए कहा कि इससे न्याय की धारा प्रभावित हुई है और न्यायाधीशों और सहायक कर्मचारियों के बीच विश्वास की कमी भी पैदा हुई है। अदालत ने यह कहते हुए सजा में नरमी बरतने से इनकार कर दिया कि इससे व्यवस्था को और नुकसान होगा और साथ ही भविष्य में ऐसे बेईमान लोगों को इस तरह का अपराध करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
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